दुर्गापूजा (दशहरा) पर निबंध:-essay on dussehra in hindi

essay on dussehra in hindi

भारतवर्ष पर्वों और त्यौहारों से समृद्ध देश है। यहाँ हर महीने कोई न कोई त्यौहार और पर्व अवश्य मनाये जाते हैं। उनके मनाने का कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य होता है। ये त्यौहार स्वस्थ समाज का निर्माण करने में, चरित्र प्रधान राष्ट्र बनाने की प्रेरणा देते हैं। कर्म करने की शक्ति प्रदान करते हैं। अन्याय और अराजकता के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ने का संदेश देते हैं। इन त्यौहारों से समाजवाद, आपसी भाईचारा,आनंद, खुशी का अजस्र प्रवाह प्रवाहित होता है जो समाज को सराबोर करने के लिए पर्याप्त होता है। विजयादशमी या दशहरा या दुर्गा पूजा भारत के प्रमुख त्यौहारों में एक है जो लगभग पूरे भारत में मनाया जाता है। यह त्यौहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन मनाया जाता है।

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दशहरा या विजयदशमी या दुर्गा पूजा का त्यौहार मानने के पीछे कई कथा प्रचलित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने महाबली रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी। इस खुशी और उल्लास के उपलक्ष्य में यह त्यौहार पूरे उत्तर भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। भारतीय समाज में इस दिन को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में भी देखा जाता है।

दूसरी कथा के अनुसार भगवती दुर्गा ने महान पराक्रमी घोर अत्याचारी राक्षस महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके भय से मुक्ति दिलाई थी। पश्चिम बंगाल में इस तिथि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। वहाँ के लोगों की यह धारणा है कि इस दिन ही महाशक्ति दुर्गा कैलाश पर्वत को प्रस्थान करती है। इसके लिए दुर्गा की याद में लोग रात भर पूजा, उपासना और अखंड पाठ एवं जाप करते हैं। नवरात्रि तक प्रायः सभी घरों में दुर्गा माँ की मूर्तियाँ सजाकर बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी झांकियां निकाली जाती है और भजन-कीर्तन होते हैं। दसवीं दिन मां दुर्गा की मूर्तियों की झांकी निकालते हैं और उन्हें नदियों तालाबों में विसर्जित कर देते हैं।


दशहरा का त्यौहार हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। यह त्यौहार राम-रावण युद्ध के प्रसंग से ही जुड़ा है। इस को प्रदर्शित करने के लिए प्रतिपदा से दसवीं दिन तक ख़ूब पूजा- अर्चना की जाती है। कलश स्थापना से लेकर नवमी तिथि तक नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। इन 9 दिनों में क्रमशः मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा,कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि ,महागौरी, और सिद्धिदात्री आदि देवियों की पूजा होती है। देवी के प्रत्येक रूप में जीवन का संदेश निहित है।माँ के इन 9 रूपों से हमें किस प्रकार जीवन जीना है, उसकी प्रेरणा मिलती है।


शैलपुत्री :- दुर्गा के इस रूप से हमें स्वाभिमानी बनने की प्रेरणा मिलती है ।
ब्रह्मचारिणी:- माँ का यह रूप तपस्या का प्रतीक है।
चंद्रघंटा:- इससे हमें यह संदेश मिलता है कि संसार में सदा प्रसन्न होकर जीवन यापन करना

चाहिए।
कुष्मांडा:- माँ का यह रूप हमें संसार में स्त्री का महत्व समझाता है।
स्कंदमाता:- माँ का यह रूप हमें बताता है कि स्त्री हो या पुरुष हो , हर किसी को ज्ञान प्राप्त

करने का अधिकार है।
कात्यायनी:- माँ का यह रूप घर- परिवार में बेटी के महत्व को बतलाता है।
कालरात्रि:- मााँ का यह रूप हमें स्त्री के भीतर विद्यमान अपार शक्ति का भान कराता है।
महागौरी:- माँ का यह रूप हमें हर परिस्थिति में संयम से रहने की सीख देता है।
सिद्धिदात्री:- माँ सिद्धिदात्री अर्थात हर सिद्ध को देने वाली है, स्त्रियों में भी यह गुण विद्यमान होता

है।

शरद ऋतु में जब यह त्यौहार मनाया जाता है। प्रकृति की शोभा अनुपम होती है। आकाश अत्यंत स्वच्छ एवं निर्मल होता है। पृथ्वी पर हरी हरी घास मखमल के समान बिछी रहती है। नदियों का नीर निर्मल हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है:——
सरिता सर निर्मल जल सोहा ।
सन्त हृदय जस गत मद-मोहा।।


अर्थात सरोवर सुंदर सरोजों से अपने हृदय को भर लेते हैं और उन पर भौंरो का मधुर गुंजन अपनी और दृष्टि आकर्षित कर लेता है। प्रकृति के इसी हास-विलास के बीच दुर्गा पूजा का आगमन होता है और हम प्रसन्नता से फूले नहीं समाते हैं।

दसवीं के दिन विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले दहन किए जाते हैं। मेलों का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर जनमानस में एक विशेष प्रकार की स्फूर्ति और चेतना उत्पन्न हो जाती है। इस त्यौहार के शुभ अवसर पर घरों की सजावट और सफाई होती है। इस दिन सर्वत्र खूब चहल-पहल होती है। बच्चे बहुत प्रसन्न रहते हैं और उनमें एक अद्भुत चेतना होती है। किसानों के लिए इस त्यौहार का विशेष आनंद होता हैं। यह त्यौहार पूर्णता धर्म भावना से ओतप्रोत त्यौहार है। इसके सभी कार्य हमारी आस्था और विश्वास के द्वारा ही संपन्न होते हैं । दशहरा ही एक ऐसा त्यौहार है। जिसे मनाते हुए हमारे अंदर राम के अनुपम आदर्श और दुर्गा की असीम शक्ति का आभास होने लगता है।

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इस त्यौहार के दिन कई स्थानों में शमी वृक्ष की पूजा की जाती है। इस पूजा से संबंधित एक पौराणिक कथा है कि महाराजा दिलीप के पुत्र रघु ने एक बार विश्वजीत यज्ञ करने का निश्चय किया। उस यज्ञ में उन्होंने अपने समस्त धन को विद्वानों , ब्राह्मणों तथा अतिथियों को दान स्वरूप दे दिया। तभी महर्षि वरतन्तु के आश्रम में अध्ययनरत एक शिष्य कौत्स, रघु के पास गया और गुरु दक्षिणा में देने के लिए 14 करोड़ स्वर्ण मुद्रायें माँगी।

रघु के पास उस समय कुछ नहीं था। वे बड़ी चिंता में पड़ गए। फिर विचार किया कि कुबेर पर आक्रमण करना चाहिए। वहीं से इतना धन प्राप्त हो सकता है। आक्रमण के भय से भयभीत कुबेर ने रात्रि में ही आकाश से एक शमी वृक्ष के ऊपर असंख्य स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी। रघु ने भी प्रसन्न होकर समस्त स्वर्ण मुद्रायें गुरु दक्षिणा के लिए कौत्स को दे दी। इसी घटना की स्मृति में विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की विधिवत पूजा की जाती है।


दशहरा का पर्व हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान है। यह त्यौहार बुराई के विरुद्ध संघर्ष करने का संदेश देता है। यह भी संदेश देता है कि अधर्म को समूल रूप से उखाड़ने के लिए धैर्य और साहस की आवश्यकता पड़ती है। भगवान राम ने रावण को पराजित करने और वध करने के लिए 10 दिनों तक संघर्ष किया और पाई थी। उसी तरह समाज से बुराइयों का उन्मूलन करने के लिए धैर्य की और संघर्ष की आवश्यकता होती है। इसे मनाने से हमारे अंदर नवजीवन का संचार होने लगता है। अतः हमें इस पर्व को निष्ठा और श्रद्धा के साथ प्रसन्नता पूर्वक मनाना चाहिए।

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