जगदीश चंद्र माथुर पर निबंध | Essay on Jagdish Chandra Mathur

Jagdish Chandra Mathur per nibandh

भूमिका

जगदीश चंद्र माथुर का जन्म मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इसलिए मध्यम वर्ग के लोगों की समस्याएं, मध्यम वर्ग के लोगों का स्थान तथा समाज से उनकी अपेक्षाएं और समाज के लिए उनका योगदान इन सारी बातों को माथुर जी ने अनुभव किया और परखा भी है। अतः उन सारी बातों को उन्होंने अपने साहित्य में चित्रित किया है।

जन्म

जगदीश चंद्र माथुर का जन्म 16 जुलाई 1970 में उत्तर प्रदेश में खुर्जा के पास एक गांव में हुआ था। एक छोटे से कस्बे में इनका बचपन बीता। इसी कारण ग्रामीण समस्याओं को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा। ग्रामीण जीवन के निकट संपर्क में आने के कारण उनको प्रकृति का असीम सौंदर्य, ग्रामीण लोगों का सादगी भरा जीवन, उनकी सरलता लोक जीवन तथा हमारे संस्कृति की अक्षय निधि के प्रत्यक्ष दर्शन हुए।

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शिक्षा

1933 में क्रिश्चियन कॉलेज इलाहाबाद में उन्होंने प्रवेश लिया और अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। 1936 में प्रयाग विश्वविद्यालय से एम० ए० प्रथम श्रेणी में पास हुए। यह समय भारत वर्ष के इतिहास में नवजागरण का काल था। तब हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद का जन्म हो चुका था। माथुर जी छायावाद की साक्षात मूर्ति सुमित्रानंदन पंत से बहुत प्रभावित हुए। जगदीश चंद्र माथुर जी की एकांकी और संपूर्ण नाटकों में भावुकता, रोमान और कवित्व का जो प्रभाव मिलता है उसका मूल स्रोत छायावाद में निहित है।

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माता-पिता

जगदीश चंद्र माथुर जी के माता और पिता अपनी सामान्य परिस्थितियों में भी परिवार का अच्छा ख्याल रखते थे। उनकी माता मध्यवर्गीय परिवार की आदर्श नारी का प्रतिबिंब थी। पिता कर्तव्यनिष्ठ, उदार और राष्ट्रीय विचारों के व्यक्ति थे। उनके पिता जी श्री लक्ष्मी नारायण माथुर स्कूल में अध्यापक की नौकरी करते थे। वे उच्च विचारों के अध्यापक होने के कारण उनकी कर्मठता अध्ययनार्थी के मन में चेतावनी बनकर रहती थी। सामान्य जनता के प्रति उनके मन में समानता और एकात्मता की भावना थी। दीन दलितों के प्रति दया का भाव था। वे अपने अध्ययन में विद्यार्थियों को राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाते थे। इस तरह माथुर जी के पिताजी राष्ट्रीयता के पुजारी थे। लेकिन वह मूल रूप में सच्चे अध्यापक थे।

जगदीश चंद्र माथुर जी के साहित्य पर माता-पिता का असर जरूर पड़ा है। उनके पिता आदर्शवादी शिक्षक होने के कारण उनकी इच्छा थी कि उनकी संतान और शिष्य उनसे भी अधिक योग्य और गुणवान बने। इसलिए उन्होंने अपने बेटे की शिक्षा में प्रारंभ से ही ध्यान दिया।

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साहित्य क्षेत्र में पदार्पण

माथुर जी के जीवन वृत्त में हमने देखा है कि उनका बाल्यकाल और यौवन काल अंग्रेजों के परतंत्र में बीता। उन लोगों का आतंक माथुर जो ने स्वयं होगा था। इसी कारण उनका मन अपना देश तथा देशवासियों की पीड़ा को महसूस कर रहा था। उसी आतंक का चित्रण उन्होंने अपने साहित्यिक कृतियों में खींचने का प्रयत्न किया। माधुरी ने 1937 में “भोर का तारा” एकांकी लिखकर साहित्य क्षेत्र में पदार्पण किया।

माथुर जी भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं। भारतीय इतिहास पर उन्हें अटूट विश्वास है। माथुर जी ने भारतीय इतिहास की गौरवपूर्ण अनेक घटनाओं को नाटकीय रूप दिया है। लेकिन उन्होंने भारतीय संस्कृति का अनुकरण नहीं किया है। वे समाज में फैले हुए अंधविश्वासों, रूढ़ियों असमानता आदि से दुखी दिखाई देते हैं। इसी कारण उनके सभी नाटकों में प्रबुद्ध कलाकार के संयम के साथ चित्रण किया है। उन्होंने मानव स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाली अमानवीय जर्जर मान्यताओं और लोकाचार पर निर्मम प्रहार किया है।

साहित्य क्षेत्र

जगदीश चंद्र माथुर जी का साहित्यिक जीवन 1929 में प्रारंभ हुआ। तब उनकी आयु 12 वर्ष की थी। 1929 में “मुर्खेश्वर राजा” नामक प्रशासन लिखा था। इसी वर्ष उन्होंने “लव कुश” नाटक की रचना की। साहित्यिक दृष्टि से यह नाटक महत्वहीन था परंतु माथुर जी का यह प्रथम प्रयास था।
माथुर एक नाटककार, एकांकीकार तथा संस्मरणकार के रूप में हमारे सामने आते हैं। लेकिन उनकी प्रतिभा बहुमुखी थी। उन्होंने अधिक एकांकी और नाटक नहीं लिखे लेकिन अपने एक दो नाटक से ही हिंदी जगत में ख्याति प्राप्त की। माथुर जी की अधिकांश एकांकी सामाजिक कथ्य से संबंध है।

प्रसिद्ध एकांकी

बंदी
घोंसले
खंडहर
ओ मेरे सपने
भोर का तारा
भाषण
विजय की बेला
रीढ़ की हड्डी

लघु नाटक

कुंवर सिंह की टेक
गगन संवारी

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निष्कर्ष

साहित्यकार का व्यक्तित्व परिवेश के अनुसार बनता है। उसी प्रकार उनका साहित्य भी परिवेश के अनुसार बनता है। माथुर जी के साहित्य देखने से हमको पता चलता है कि उस वक्त के परिवेश का माथुर के नाटकों पर प्रभाव है। दो विश्व युद्धों के बीच माथुर पले हैं। इसलिए उनके कृतियों पर युद्धों के प्रसंग दिखाई देते हैं। उनके कृतित्व में बहुत कुछ ऐसा है जो अलग से उनकी पहचान करा देता है। वे मूलतः सामाजिक जीवन के उदारचेता द्रष्टा होने पर भी व्यक्तिवादी चेतना के सृष्टा है। माथुर जी का कृतित्व अनुभूति की तीव्रता और उसके प्रमाणिकता का अपूर्व आभास देता है।

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